भाई दूज पर्व

15 नवम्बर, 2012 कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि के लिये भाई दूज का पर्व बडी धूमधाम से मनाया जायेगा. भाई दूज को यम द्वितीया के नाम से भी जाना जाता है. भाई दूज पर्व भाईयों के प्रति बहनों के श्रद्धा व विश्वास का पर्व है. इस पर्व को बहनें अपने भाईयों के माथे पर तिलक लगा कर मनाती है. और भगवान से अपने भाइय़ों की लम्बी आयु की कामना करती है.
हिन्दू समाज में भाई -बहन के स्नेह व सौहार्द का प्रतीक यह पर्व दीपावली दो दिन बाद मनाया जाता है. यह दिन क्योकि यम द्वितीया भी कहलाता है. इसलिये इस पर्व पर यम देव की पूजा भी की जाती है. एक मान्यता के अनुसार इस दिन जो यम देव की उपासना करता है, उसे असमय मृ्त्यु का भय नहीं रहता है.

हिन्दूओं के बाकी त्यौहारों कि तरह यह त्यौहार भी परम्पराओं से जुडा हुआ है. इस दिन बहनें अपने भाई को तिलक लगाकर, उपहार देकर उसकी लम्बी आयु की कामना करती हे. बदले में भाई अपनी बहन कि रक्षा का वचज देता है. इस दिन भाई का अपनी बहन के घर भोजन करना विशेष रुप से शुभ होता है.


भाई दूज के विषय में मान्यता 
एक पौराणिक मान्यता के अनुसार यमुना ने इसी दिन अपने भाई यमराज की लम्बी आयु के लिये व्रत किया था, और उन्हें अन्नकूट का भोजन खिलाया था. मिथिला नगरी में इस पर्व को आज भी यमद्वितीया के नाम से जाना जाता है. इस दिन चावलों को पीसकर एक लेप भाईयों के दोनों हाथों में लगाया जाता है. और साथ ही कुछ स्थानों में भाई के हाथों में सिदूर लगाने की भी परम्परा देखी जाती है.
भाई के हाथों में सिंदूर और चावल का लेप लगाने के बाद उस पर पान के पांच पत्ते, सुपारी और चांदी का सिक्का रखा जाता है, उस पर जल उडेंलते हुए भाई की दीर्घायु के लिये मंत्र बोला जाता है. भाई अपनी बहन को उपहार व मिठाई देते है. देश के अलग- अलग हिस्सोम में इस परम्परा में कुच न कुछ अंतर आ ही जाता है.


भाई दूज से जुडी कथा
भाई- बहनों से जुडे जितने पर्व मनाये जाते है, उनमें रक्षा-बंधन और भाई-दूज दो पर्व विशेष है. कथा के अनुसार यम देवता ने अपनी बहन को इसी दिन दर्शन दिये थें. यम की बहन यमुना अपनी बहन से मिलने के लिये अत्यधिक व्याकुल थी. अपने भाई के दर्शन कर यमुना बेहद प्रसन्न हुई. यमुना ने प्रसन्न होकर अपने भाई की बहुत आवभगत की. यम ने प्रसन्न होकर उसे वरदा दिया ककि इस दिन अगर भाई-बहन दोनों एक साथ यमुना नदी में स्नान करेगें, तो उन्हें मुक्ति प्राप्त होगी.
इसी कारण से इस इन यमुना नदी में भाई- बहन के साथ स्नान करने का बडा महत्व है. इसके अलावा यम ने यमुना ने अपने भाई से वचन लिया कि आज के दिन हर भाई को अपनी बहन के घर जाना चाहिए. तभी से भाई दूज मनाने की प्रथा चली आ रही है. जिन भाईयों की बहनें दूर होती है. व भाई अपनी बहनों से मिलने भाईदूज पर अवश्य जाते है. और उनसे टीका कराकर उपहार आदि देते है.


भाई दूज विधि- विधान


भाई दूज पर्व पर बहनें प्रात: स्नान कर, अपने ईष्ट देव का पूजन करती है. और भाई के आने पर उसे उपयुक्त स्थान देते हुए. चावल के आटे से चौक तैयार करती है. इस चौक पर भाई को बैठाया जाता है. और उनके हाथों की पूजा की जाती है. भाई की हथेली पर बहने चावल का घोल लगाती है. उसके ऊपर सिन्दुर लगाकर कद्दु के फूल, पा, सुपारी, मुद्रा आदि हाथों पर रख कर धीरे धीरे हाथों पर पानी छोडते हुए मंत्र बोला जाता है.

कहीं-कहीं इस दिन बहनें अपने भाइयों के माथे पर तिलक लगाकर उनकी आरती उतारती है. और फिर हथेली में कलावा बांधती है. भाई का मुंह मीठा करने के लिये भाईयों को माखन - मिश्री खिलाती है. संध्या के समय बहनें यमराज के नाम से चौमुख दीया जलाकर घर के बाहर दीये का मुख दक्षिण दिशा की ओर करके रख देती है. इस दिन आसमान में उड्ती हुई चील देखने के विषय में यह मान्यता है कि बहने भाईयों की आयु के लिये जो दुआ मांगती है, वह दूआ पूरी होती है.


भाई दूज पर्व का महत्व


भाई दूज पर्व क्योकि यम द्वितीया के नाम से भी जाना जाता है. यह पर्व भाई -बहन के बीच स्नेह के बंधन को और भी मजबूत करता है. भारतीय परम्परा के अनुसार विवाह के बाद कन्या का अपने घर, मायके में कभी- कभार ही आना होता है. मायके की ओर से भी परिवार के सदस्य कभी- कभार ही उससे मिलने जा पाते है. ऎसे में भाई अपनी बहन एक प्रति उदासीन न हों, उससे सदा स्नेह बना रहें, बहन के सुख:दुख का पता चलता रहें. भाई अपनी बहनों की उपेक्षा न करें, और दोनों के सम्बन्ध मधुर बने रहें. इन्ही भावनाओं के साथ भाई दूज जैसे पर्व मनाये जाते है.